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गोविन्द उपाध्याय

साहित्य और ज्योतिष के मूर्घन्य विद्वान गुरु डा0 अशोक शर्मा पर दो शब्द
लिखना मेरे लिए 8: कार्य तो है ही, लेकिन फिर भी उनके सान्निध्य और
मार्गदर्शन में बिताये कुछ पलों को शब्द रूप देने का प्रयास कर रही हूँ।
मेरे गुर केवल साहित्य और ज्योतिष के ही गूढ़ज्ञाता नहींथे,अपितु उन्हें हर
विषय की गहनतम जानकारी थी। लगभग 70 प्रतिशत देशों की यात्रा कर
चुके डा0अशोक शर्मा विदेशी संस्कृति और सभ्यता से बखूबी परिचित थें,
लेकिन उनकी दृष्टि मैं भारतीय संस्कृति और सम्यता ओष्ठतम थी |उनके
सहज, सरल व्यवहार,आत्मीयता और सुखद मार्गदर्शन को याद करती
हूँ तो लगता ही नहीं कि गुरु जी इस दुनिया में नहीं हैं। नहीं, वे आज भी
जीवित हैं, अमर हैं (हम न मर मरिहे संसारा), उन्हें कोई नहीं मार
सकता। मन सम्पाती’,सौंकलें दी पड़ी हैं’ जैसी रचनाएँ, प्राच्य मंजूषा
के सम्पादकीय में लिखे गये अनन्य चिन्तन’, देश-विदेशों में निहित
उनके शिष्य डा0 अशोक शर्मा के जीवित होने का प्रमाण है। गुरु डा0
अशोक शर्मा से मेश परिचय अक्टूबर 2008 में हुआ था। सितम्बर 202
में गा निया छोड़कर चलें गये। इस अल्प समय के सान्निध्य में पुरी मुच्चे
पी-एच0डी0 जैसी डिग्री दिला गये और वह भी बिना कुछ लिये। कबीर
दास जी ने लिखा ्् को ऐसा चाहिए …। लेकिन उन्होंने मुझे हमेशा
दिया ही, मेरी सामर्थ्य के अनुसार भी मुझसे कूछ लिया गुरु ही नहीं
अपितु के भी यही विचार हैं। 2। अप्रैल 202 को आगरा विश्वविद्यालय में
मेरी पी-एच0डी0 की अखिक परीक्षा थी। मैं मेरी सहेली शालेन्द्री, मैरे
चाचाजी और मैरे गुरु डा0 अशौक शर्मा आगरा विश्वविद्यालय जा रहे थे।
खंदौली के पास एक पेट्रोल पम्प के नजदीक उन्हें प्यास लगी और मेरे
चाचाजी ड्राइवर से गाड़ी फुकवाकर पानी लेने उतरे तो गुरुजी पानी की
बोतल के भी पैसे देंने लंगे। इससे स्पष्ट है कि वह विद्यार्थी से कुछ लेने के
पक्ष में नहीं थे न तो सैद्धान्तिक रूप से और न व्यावहारिक रूप से ही।
उनके इस आचरण से आज के धन पक गुरुओं को सीख लेनी चाहिए जो
पी-एकडी0 कराने की बड़ी-बड़ी फीस बसूल किया करते हैं| मैं भेंड
करने के लिए माँ शाएदा की एक कांस्य प्रतिमा खरीदकर ले गयी थीं।
मैंने सोचा था कि पी-एचएडी0 की मौखिक परीक्षा होने के बाद यह
प्रतिमा मैं आर्पित करुँगी,लेकिनऐसे गुरु जिन्होंने मुझसे कभी एक कप
चाय न पी हो, उन्हें वह प्रतिमा देने में यु बड़ा संकोच लग रहा था।
आगरा से वापस लौटकर मैं चनके घर तक आ गयी,लेकिन उन्हें प्रतिमा
देने की हिम्मत मेरे अन्दर नहीं आयी । जब मैंने 388 कुजी के साथ
उनके घर में प्रवेश किया तो वह सीधे अन्दर गये (शायद कपड़े बदलने
के लिए)मैंने मौका पाकर वह प्रतिमा गुरु माताजी को दे दी उन्होंने उसे
ले तो लिया लेकिन मुझ पर बहुत नाराज हुईं — “क्या जरूरत थी तुम्हें
इसे देने की, इसमें पैसे खर्च नहीं हुए होंगे क्या?क्या यह तुम्हारे घर में
बनती है?” पता नहीं यह कैसा संयोग है?डीएएस0 कॉलिज के हिन्दी
विभाग के समस्त 4228 कुओं और गुरु-माताओं के यही विचार हैं कि
शिष्य से कुछ नहीं लेना चाहिए। लेना तो दूर वे उल्टे देने को तैयार रहती
हैं।डीएएस0 कॉलिज के हिन्दी विभाग के एक प्राध्यापक के निर्वेशन में
एक विद्यार्थी शोध कर रहा शा। वह पढ़ने में अच्छा था, मेहनती था
लेकिन उसकी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी|उम्तके पास ढंगके कपड़े
न थे। गुरु माता का उसके प्रति स्नेह तो था ही क्योंकि विद्यार्थी मेहनत
करता था। उन्होंने देखा कि मेरा यह पुत्र ‘शोधार्थी’ है इसलिए इसके
पास ठीक-ठाक कपड़े होने की आवश्यकता है।उन्होंनेबाजार से लाकर
उसे दो जोड़ी अच्छे कपड़े दे दिये। डा0 अशोक शर्मा जितने विद्वान थे
उतने हीं सहज और सरल थे। ऐसा लगता है कि विद्वत्ता और सहजता,
सरलता मिलकर एक हो गयी हों | जरूरतमन्दों की मदद के लिए वह
हमेशा तैयार रहा करते थे। पढ़ने वाले विद्यार्थियों का उन्होंने सदैव मनो-
बल बढ़ाया, विभिन्‍न तरीकों से उनकी मदद की। काय्यशास्त्र जैसा
विषय जो प्रायः विद्यार्थियों को कठिन लगता है गुरुजी से जिन विद्यार्थियों
ने पढ़ा उनका प्रिय विषय बन गया। मुझे भी एम0ए0 उत्ततरार्ड्ध में
उनसे काव्यशास्त्र पढ़ने का सौभाग्य मिला था।वह जब कक्षा में पढ़ाते थे
तब सभी विद्यार्थी शान्त और एकचित होंकर पढ़ा करते थे। मुझे ऐसा
कोई दिन याद नहीं है जिस विन उन्होंने कक्षा में किसी विद्यार्थी को
डाटा हों। हमेशा सहज, सरल, स्नेह के साथ विद्यार्थियों से व्यवहार
किया।वह् विद्यार्थियों से कहा करते थे कि हर विषय की जानकारी रखो,
इधर-उधर की बातों में समय बर्बादे मतं किया करों | वह अपना
उदाहरण देंते थे कि -है झे विद्यार्थीजीवन की कोई ऐसी शाम याद नहीं
है जिस शाम मैंने दोस्तों के साथ बैठकर गण्पें मारी हों। मैं हमेशा
किताबें पढ़ा करता था, मैंने कभी समय बर्बाद नहीं किया।”चर आये
अतिथि का सम्मान करना, उससे आत्मीयतापूर्वक व्यवहार करना
गुरुणी का स्वभाव था। ज़नवरी 2008 में उन्होंने हाथरस में त्रिदिवसीय
राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया था | संगोष्ठी में भाग लेने, मैं भी
हाथरस गयी थी। पप्जी रुजी ने मुझसे कहा दे त्तीन दिन यहीं रुकौ,मैं
पहली बार उनके घर गयी, उस पर गुरुजी ने रुकने को कहा तो मुझे
संकोच हो रहा था। लेकिन उनके आत्मीयतापूर्ण स्नेह से मेरा सारा
संकोच उड़नछू हो गया। पु कहा कि -“बेटा कोई झिझकऔर संकोच
मत करना | यह चूहा माँ के समान हैं (गुरु माताजी के लिए) किसी
चीज की आवश्यकत्ता हो तो इनसे तुरन्त माँगना |” हाँ, गुरु माता
(जिन्हें मैं आंटी कहती हैँ) ने भी मेरे साथ माँ जैसा ही व्यवहार किया
था| उप्त सहज, सरल, स्नेह को मैं भूल ही नहीं सकत्ती |यही नहीं
अपितु अनेक ऐसे संस्मरण हैं जो की आत्मीयता और सरलता के प्रमाण
हैं। एक बार मैं अपनी सहेली रजनी को एमएफिल0 की पा दिलाने
अलीगढ़ से आगरा गयी थी। मैंने उससे कहा कि आगरा से अलीगढ़
लौटते समय सर के घर (हाथरस) होते हुए लौटेंगे। रजनी को उनके
घर जाने में संकोच लग रहा था। उसे लग रहा था कि – “पता नहीं सर
क्या सोचेंगे? मैं उनके घर क्यों आयी हूँ।” मेरें बार-बार समझाने पर
भी वह उनके घर जाने में झिझक रही थी। मैंने आगरा से गुरुजी को
फोन किया कि मैं और रजनी आपके घर आ रहे हैं। रजनी भी उनकी
विद्यार्थी रही थी,वह उसे जानते थे। रजनी रास्ते भर मुझसे यही कहती
रही — “दीवी पता नहीं सर क्या सोचेंगे, आप चली जाना मैं बस
स्टेण्ड पर बैठी रहूँगी।”लेकिन मैं उसे अपने साथ ही लेकर गयी | जैसे
ही हम उनके घर पहुँचे, गुरुजी देखते ही खुश हुए और पहले रजनी
से ही बोले |उन्होंने कहा – “रजनी तुम आगरा किस लिए गयी थीं।”
उसके बताने पर कहा, “परीक्षा कैसी हुई?” जब हम हाथरस से लौटे
तो रजनी रास्ते भर उनके व्यवहार की तारीफ करती रही और काफी
खुश थी | ऐसा स्वभाव था मेरे गुरुजी का, वह आज भी उस पल को
याद करती है। दिसम्बर 2007 में मैंने गुरुजी से कहा कि मैं आपके
निर्देशन में शोधा-कार्य करना चाहत्ती हूँ।उन्होंने मुझे शोध-कार्य कराने
की सहज स्वीकृति तो दे दी लेकिन शर्त रखी कि -“तुमको मेहनत
करनी होगी,ईमानदारी से काम करना होगा, काम स्वयं करना होगा।
मैं बोलकर नहीं लिखवाऊँगा। “इसके साथ यह भी कहा कि -“मैं
चाहता हूँ कि मेरा स्टूजैण्ट आगे बढ़े,इसलिए तुमको साहित्यिक कार्य-
क्रमों में उपस्थित होना चाहिए।”मैंने उनकी शर्त को स्वीकार कर लिया
मैंने मेहनत और ईमानदारी से काम किया।
चूँकि मानव मन बड़ा विचित्र होता है| अगर उसे थोड़ा सा भी सहारा
दिखाई दे तो कभी-कभी उसका मन लक्ष्य से भटक भी जाता है। मेरे
साथ भी कुछ ऐसा हुआ। मैंने अपने शोध-कार्य के चार अध्याय तो पूरे
कर लिए, लेकिन पांचवें अध्याय में निहित ‘गीत के गठन की पद्धेतियाँ
मेरी समझ में नहीं आ रही थीं। मैंने हाथरस जाकर उनसे कहा कि सर
मेरी समझ में गीत के गठन की पद्धतियाँ नहीं आ रही हैं | उन्होंने मुझे
समझाया और साथ ही कहा कि न समझ में आये तो मैं देख लूँगा। क्यों-
कि वह उस दिन जल्दी में थे उनकों कहीं जाना था। मैं देख लूँगा का
अर्थ मैंने समझा कि सर बोलकर लिखवा देंगे । इसलिए गीत के गठन
की पद्धतियाँ लिखने में मेरा मन नहीं लगा, मैंने काम नहीं किया|दूसरे
दिन मैंने हाथरस जाकर कहा कि सर मेरी समझ में नहीं आया है। मेरे
द्वारा इतना कहने पर ही वह पता नहीं कैसे मे रे मन की बात जान गये
और बोलें – “बेटा मैं बोलकर कभी नहीं लिखवा सकता |नहीं समझ में
आया है तो एक दफे नहीं दस दफे पूछ लो |” मेरा भ्रम तुरन्त दूर हो
गया और मैंने उस अध्याय को ध्यानसे समझा।घर आकर मैंने विस्तार से
लिखा डरे दिन जब मैं उसे दिखाने हाथरस गयी तो: उन्होंने मैरा काम
चैक किया और कहा- “बहुत अच्छे, बरी गुड |”
पे यह उम्मीद नहीं थी कि गुरुजी दुनिया छोड़कर इतनी जल्दी चले जायेंगे
। 30 सितम्बर 2042 के दिन जब उन्होंने दुनिया छोड़ी उस विन मैं
इलाहाबाद में थी। उसी दिन शाम को ‘प्रयागराज ड्रैन’से मुझे अलीगढ़
आना था | प्रयागराज इलाहाबाद से 9.30 बजे रात को चली लेकिन
इलाहाबाद से थोड़ा सा आगे ‘खागा’ स्टेशन के समीप ट्रेन का इंजन
फेल हो गया। जो ट्रेन दूसरे दिन सुबह 4.0 बजे के लगभग अलीगढ़
पहुँचती वह सुबह 8.30) बजे के लगभग अलीगढ़ पहुँची। मैं जैसे ही
स्टेशन पर उत्तरी मेरे पास डा0देवेन्द्र कुमार का फोन आया |जल्दबाजी
में मैंने फोन नहीं उठाया। जब मैंने वापस कॉल की तो उसने मुझसे कहा
“दीदी आपने अखबार में अशोक सर के बारे में पढ़ा हैं |” मैंने कहा –
“उनके बारे में क्या है, मैंने तो आज अभी अखबार ही नहीं देखा।”मैंने
सोचा शायद उनको कोई पुरस्कार मिला होगा | मैंने यह तो कल्पना
भी नहीं की थी कि मैं देवेन्द्र के मुँह से यह शब्द सुनूँगी। उसने कहा क

“दीदी अशोक सर नहीं रहे।” मैं अवाक रह गयी रे विश्वास ही नहीं
हो रहा था| मैंने डा0 वेदप्रकाश ‘अमिताभ’ सर को फोन लगाया
और कहा कि सर मैंने जो अशोक सर के बारे में सुना है,क्या वह सही
है| उनका जबाव था -“हाँ” बेटा सही है। अशोक जी नहीं रहे। उनकी
शकक्‍- यात्रा आज डर 7 बजे प्रारम्भ हाकर 3४ 2224 घाट पहुँच
जायेंगी, उनके यहाँ मथुरा ले जाया जाता है। में भी उनकी शव-यात्रा
मैं नहीं हो सका क्योंकि मैं इंस समय जौनपुर में हूँ।” मुझे अफसोस है
कि मैं अपने गुरु के अन्तिम दर्शन भी न कर सकी | सूरज डूबा चाँद
छुपा, तारे भी टूट गये। नेह का बच्चन बना रहा, देह के छूट गये।
प्रवक्‍ता
जैर कन्या महाविद्यालय
खैर (अलीगढ़)

June 24, 2022

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