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ड्ा० बेदबती राठी

कुछ प्रतिमाएँ ऐसी होती हैं जो समय को बहुत पीछे छोड़ जाती हैं।समय
अपनी अबाधगति से प्रवहमान होता रहता है और प्रतिभाएँ समय को
छोड़कर आगे बढ़ जाती हैं।उन्हें कभी इस बात कीपरवाह नहीं होती कि
लोग उनका उचित मूल्यांकन कर भी पा रहे हैं या नहीं।ऐसी प्रतिमाएँ तो
बस आगे बढ़ती जाती हैं, बढ़ती जाती हैं और अपने पदचिहद्दनों के
माध्यम से ऐसी विरल अनुभूतियाँ छोड़ जाती हैं जहाँ उन स्मृतियों में हम
अनुभूति के पड़ावों को तलाशते रहते हैं त्था पछतावे के अतिरिक्त हमारे
हाथ में कुछ नहीं आता | ऐसे कितने ही पड़ाव हैं उनके और मेरे बीच|
विद्यार्थी जीवन के और सहकर्मी के रूप में । जो स्वर्गीय अशोकजी के
व्यक्तित्व का आज उनकी अनुपक्थिति में आंकलन करने के लिए
आवश्यक एवं उल्लेखनीय प्रतीत होते हैं|ऐसी ही विलक्षण प्रतिभा के
धनी थे डा0 अशोक शर्मा।
ब मैं एम ए0ए0 उत्तरार्द्ध की विद्यार्थी थी तब पहली बार उनके दर्शन
कक्षा में हुए। वे हमें काव्यशास्त्र का पेपर पढ़ाने के लिए डीएएस0
कॉलेज के कमरा नं0 49 मैं उपस्थित हुए थे तब उन्‍होंने में अपना
परिचय दिया था। वे भारतीय काव्यशास्त्र और पाश्चात्य काव्यशास्त्र
दोनों को पढ़ाते थे। पहले दिन जब ‘काव्य के हेतु’ कक्षा में उन्होंने
हमें पढ़ाये तो हम मन्त्र-मुग्ध से उनका पढ़ाना देखते रहे। विषय से
सम्बन्धित धारा प्रवाह संस्कृत के श्लोक उनके ग्रीमुख से निकल रहे थे।
हम मंत्र कीलित सर्प की तरह बैठे रहे थे और अपने को बड़ा धन्य
अनुमव करते रहे थे। तब हमें एहसास हुआ कि काव्यशास्त्र जैसा
शुष्क विषय भी इस रोचकता और कुशलता से पढ़ाया जा सकता है।
अब तो हम पर उनका नशा हावी था। कक्षा में ‘आँखें’ उनके घण्टे
की प्रतीक्षा में रहती कि कब उनका घण्टा हो और वे कक्षा में आयें।
कक्षा में आते ही वे प्राध्यापक के लिए निर्धारित मेज पर प्रतिष्ठित हो
जाते फिर पूछते कल कहाँ छोड़ा था और शुरु हो जाते उनका धारा
प्रवाह पढ़ाना और बिना आलस्य के उठ खड़े होना फिर ब्लैकबोर्ड पर
श्लोकों का लिखना हम देखते ही रह जातें। राइटिंग ज्ञो उनकी बेहद
सुगढ़, सुन्दर थी। जैसे वे सुगढ़-सुन्दर,लम्बे-चौड़े डील-डौल वाले
थे, लिखावट भी वैसी थीं। लोक जीवन मेँ ऐसा कहा भी जाता है कि
जैसा व्यक्तित्व होगा वैसी राइटिंग भी होगी ।नॉलेज तो उनमें जबर्दस्त
थी क्योंकि वे दुनिया में प्रसिद्ध इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रोड़क्ट
थे। वहाँ का परिवेश उनके व्यक्तित्व में एच-बस गया था |उनका
पढ़ाना अन्य प्रोफेसरों से एकदम भिन्‍न था।सबसे अन्तिम घण्टा हमार
काव्यशास्त्र का ही हुआ करता था, तब जब भी हम उनके घण्टे से
पढ़कर घर लौटते, उनका नशा हमारे दिलो-दिमाग पर छाया रहता|
घर पहुँचकर कमी पिताजी, कभी माँ, कभी घर के अन्य सदस्यों से
उनकी और उनके पढ़ाने की चर्चा किया करते। जो गुरु विद्यार्थी को
स्नेह्ठ करता हो, उसकी समस्या का समाधान करता हो, उमप्तकी
अज्ञान की पर्तों को खोलता हो ऐसा गुर ही विद्यार्थी से परमात्मा का सा
सम्मान पाता है। विद्यार्थी की असीम निष्ठा होती है ऐसे गुरु के प्रंति।
फिर एक अटूट रिश्ता बन जाता है गुरु और विद्यार्थी के बीच में । जो
अनकहा होते भी बड़ा मजबूत होता है और जिसकी उम्र बहुत लम्बी
होती है। ऐसा ही हाल हमार हो चला था, हम सभी विद्यार्थी कक्षा में
बड़ी बेसब्री से उनकी प्रतीक्षा करते और हर आहट को उनकी आहट
समझकर कक्षा से बाहर झौँकते।
कक्षा में आने में वे प्रायः लेट हो जाते क्योंकि वे प्रतिदिन हाथरस से
आतै-जात्ते थे | हमारा धैर्य का बाँघ जब टूट जाता तो हम कॉलेज से
घर लौटने लगते तो अक्सर उनकी और हमारी मैट कॉलेज के गेट पर
हो जाती। तब हमें क्लास छूटने का बड़ा अफसोस होता। वें हमेशा
यहीं पूछा करते – ‘क्या घण्टा बज गया।’ और हम बड़ी मासूम
मुद्रा में गर्दन हिला दिया करते |हमारी इस चिंन्तित्त मुद्रा को देखकर
वे यहीं कहा करते आप लोग चिन्ता न करें मैं एक्स्ट्रा कक्षाएँ पढ़ा दूँगा
।”और जब वे अतिरिक्त कक्षाएँ लेते तो दो-तीन घण्टे एकसाथ पढ़ाया
करते। जिन्हें मैं कभी भूल नहीं पाती कि कक्षा पढ़ने के आनन्द के क्षण
भी ऐसे होते हैं। प्रतिमा जहाँ भी जाएगी अपना प्रभाव जरूर छोड़ेगी।
उसे जिधर स्थान मिलेगा वह अपना आकार स्वयं ले लेगी | स्व0 डा0
अशोक शर्मा जी की भी स्थिति ऐसी ही विलक्षण थीं। वे बड़े मस्तमौला
प्रकृति के इंसान थें। लेखन हो या अध्यापन,ज्योतिष हो या कर्मकाण्ड,
व्यवहार हो या दोस्ती सभी मेँ उनका अपना अनौखा अन्वाज था।
पूरे हाथरस में उनके ज्योतिष परक ज्ञान का बोलबाला था।उनके
ज्योतिष ज्ञान के डंके देश में क्या विदेशों में भी बजते थे।एक अजीब
विरोधाभास था उनके व्यक्त्तित्व में उन्हें क्रिकेट (मैच) देखना बहुत
पसन्द था,जिस भी दिन मैच आता कॉलेज से छुट्टियाँ ले लिया करतेऔर
यंदि कहीं लाइट चली जाए तो जैनरेटर किराये पर मंगाकर या जिसके
यहाँ लाइट की व्यवस्था होती और पूरे आराम के साथ मैच देखने का
प्रबन्ध होता वहीं उनका आसन जमता।कहाँ महन्तई और कहाँ आधु-
निक शौक मैच देखना जैसे विरोधों को छूते थे डा0 अशोक जी | स्व
डा0अशोक जी में काव्यत्व चरमकोटि का था। इलाहाबाद में हर शाम
वह ‘काफी हाउस’ में बैठते वहाँ सुमित्रानन्दन पन्‍्त से लेकर न जाने
कितनी बड़ी साहित्यकार हस्तियों से उनकी मुलाकातेँ होतीं,चर्चाएँ
होतीं। कितना कुछ उनके बीच उन्हें सीखने को मिलता ये बातें वह प्रायः
कक्षा में बताया करते थे। उच्च शिक्षा अर्जन के लिए जब उन्हें इलाहा-
बाद जाना पड़ा और हाथरस छोड़ना पड़ा,कितना संघर्ष करना पड़ा
उन्हें इन प्रसंगों को अवसर मिलते ही वे सुनाया करते थे। झुकना तो
उन्होंने जैसे सीखा ही नहीं था। लोग उनकी कवि- प्रतिभा को पहचान
नहीं पायें थे। बहुत उत्कृष्ट झणी का कवित्व था उनकी रचनाओं में।
एक बार हमारे विभागाध्यक्ष श्रद्धेय डा0औराम शर्मा जी के संरक्षण
में एक काव्य-गोष्ठी मेरे घर पर सम्पन्न हुई । डा0 अशेक जी ने ऐसा
समां बाँधा कि सबको पीछे छोड़ दिया। माव और शिल्प दोनों ही बड़े
व्यवस्थित ढंग से उनकी कविताओं में रहते। शिल्प विधान की दृष्टि से
उन्होंने ऐसे नवगीतों का प्रस्तुतीकरण किया जो अभूतपूर्व था आज जब
चनके न रहने पर उनके संग्रह -‘सांकलें टूटी पड़ी हैं’ से मैंने उनके
नवगीत और मुक्त छन्‍्द की कविताएँ पढ़ीं तो भीतर लक सिरह
कर एह गयी इतनी प्रभावी रचनाएँ हो सकती हैं ये बात तो मैंने कभी
सोची भी नहीं थी। एक विद्यार्थी और प्राध्यापक की सोच और चिन्तन
प्रक्रिया मेँ जमीन-आसमान का अन्तर होता है| अब सिर्फ पछतावे के
अलावा क्‍या था मेरे पास | यहीं मलाल रहा कि उनके रहते उनसे
बतियानें,बैठते समय यह चर्चा क्यों नहीं आयी? क्‍यों नहीं कभी समय
निकाल पायी उनसे रचना-प्रक्रिया को लेकर चर्चा करने के लिए?
हालांकि कभी-कभी रचना- प्रक्रिया पर चलतै-फिरते जिक्र हो जाया
करता।मैं भी उनसे रचनाएँ सुनने बैठ जाती और वे पूछा करते तुम्हें किस
रस की कविताएँ पसन्द हैं तो मैं करुणा,दुःख, वेदनाओं वाली रचनाएँ
और घनानन्द तथा महादेवी वर्मा का जिक्र करके उठती तब वे सही
सलाह देते कि मैं ऐसी दुःख,वेदना वाली रचनाएँ कभी न लिखूँ। क्योंकि
दुःख, वेदना और रोनै-धोने से हमेशा जीवन में नकारात्मकता आती है,
कष्ट आते हैं ऐंसा वे कहते और अपना उदाहरण देते कि ‘मैं पहले इसी
तरह की कविताएँ लिखता,जीवन दुःखों से भर गया फिर मैंने अपनी
सोच बदलीं और लिखा –
गाया दर्द बहुत दिन मैंने, अब मैं मंगलगीत लिखूँगा।
शेता रहा जनम से अब तक, अब मैं पहली बार हँसूंगा।।
भाथे मढ़ा हुआ हूँ तो क्या राजमुकूट जैसा चमकूँगा |
अब तक पढ़ा व्याकरण मैंने अब मैं सरस कविश पढ़ूँगा।।
इस प्रकार रोज-रोज मिलने और अनेक घटनाओं के बाद हमारे सम्बन्ध
बेहद आत्मीय हो गये थे। वे बिना किसी संकोच के घर आ सकते थै।
हम भी चाहे जब उनको शिष्य के अधिकारक के साथ बुला सकते थे।
अब परिवार के हर छोंटे-बड़े कार्यक्रमों में उनको बुलाया जानें लगा।
ज्यो-तिष के तो वे प्रकाण्ड विद्वान थे ही। आज का युग कितना ही आधु-
निक क्‍यों न हो पर मविष्य और जन्मपत्री को लेंकर व्यक्ति की मानसि-
कता आज भी परम्परावादी है। प्रत्येक व्यक्ति अपने भाग्य और भविष्य
को जानना चाहता है। घर में भी उनके द्वारा अच्छी जन्मपत्री की देखे
जाने की चर्चाएँ होती रहती।पिताजी भाइयों की जन्मपत्रीं दिखाया करते।
कमी स्वास्थ्य, कभी कारोबार, कमी शादी-विवाह को लेकर जन्मपंत्री
दिखायी जाती और चर्चाएँ हुआ करती |वे प्रायः जन्मपत्री हाथरस(गद्‌वी)
पर दिखाने की बात कहते।भततीजोंकी शादी के लिए आयी जन्मपन्री का
अन्तिम निर्णय उन्हीं के द्वारा दिया जाता |समय कैसे आगे बढ़ जाता है
पता ही नहीं लगता। सन्‌ 2000में मेरी नियुक्ति धर्म समाज महाविद्यालय
में हुई जिस पर उन्हें बेहद प्रसन्नता हुई। विभाग में सर्वाधिक प्रश्नन्नता उन्हें
इस बात की थीं कि मैं उसी कॉलेज की उपलब्धि थीं |उन्होंने मैरे साक्षा-
त्कार की तैयारी भी करायी और अनेक सुझाव भी दिये। वे सदा मुझ पर
गर्व करते हुए यहीं कहा करते -जितना सम्मान और श्रद्धा ह-मारा वेदवर्ती’
न उत्तना कोई बाहर से आने वाला केण्डीडेट नहीं कर सकता।आखिर यह
हमारी ही तो निर्मिति अब इस नये रिश्ते की शुरुआत मेरे और उनके बीच
हो चुकी थीं। अब हम गुरु-शिष्या से सहकर्मी हो गये थे । मुझे तो उनके
बराबर बैठने मैं भी संकोच अनुभव होता |उनके विमाग में प्रवेश करते ही
मैं खड़ी होती तो बड़े स्नेह और आदर के साथ बिठा देते | बेशक इस नये
रिश्ते में मैं सहकर्मी हो गयी थी पर मैंने सदैव उनके सामने अपने आपको
विद्यार्थी हीं पाया। मुझे विद्यार्थी ही रहने में सुखद अनुभूति होती थी।
अपने अनुभव और नसीहतें वें सदैव हमें अवसर पाते ही दिया करते -“कि
कक्षा में पढ़ाते समय अपने किसी सहयोगी अध्यापक की बुराई मत करना,
अन्यथा विद्यार्थी तुम्हारा कभी सम्मान नहीं करेंगे। “कभी-कभी अक-
स्मात्‌ ऐसी घटनाएँ घट जातीं,जिनका हमें पता भी नहीं होता। मैं कक्षा में
पढ़ातती रह जाती और घण्टा सुनाई ही नहीं देता कि कब बज गया?और
सर कक्षा के बाहर प्रतीक्षा करके विमाग में चले आते | एक दिन क्या
देखती हूँ कि घण्टा बज गया है,सर बाहर खड़े हैं और वहाँ से खड़े होकर
मेरी पढ़ाने की शैली को देखकर मुग्ध भाव से, आश्चर्यमिश्रित ढैँग से देख
रहे हैं। पता नहीं शिष्य में गुक कब उत्तर आता है वह अपना अक्स मुझमें
ढूँढ रहे थे। जिस तरह पिता बेटे के रूप में जीता है,उसी तरह गुरु शिष्य
के रूप में जीता है। मैंने विभाग में लौटकर उनसे पूछा भी कि,“आप
कक्षा से लौंट क्यों आये” तो मुस्कराकर रह गये। तब मुझे लगा कि वे
सचमुच सच्चे गुरु हैं क्योंकि गुरु की उदारता ही शिष्य का पैभव बर्दाश्त
कर सकती है। सच्चा गुरु वही है जो शिष्य के हाथों पराणित होने में गौरव
अनुमव करता है।अब उनकी प्रतिमा विदेश तक कीं चहल-कदमी कर
चुकी थी। वे प्रत्येक वर्ष छुट्टियों में अमेरिका, कनांडा, वाशिंगटन,
आस्ट्रेलिया आदि अनेक स्थानों पर जाते। ज्योतिष सम्बन्धी उनकी
उपलब्धियाँ और जानकारी लोगों के आकर्षण का केन्द्र थीं |साहित्य तो
उनकी एग-रग में बसा ही था। वह प्रायः वहाँ के किस्से सुनाया करते कि-
“विदेशियों में जोखिम उठाने की बड़ी शक्ति होती हैं।”वे ये भी बताते कि
-“कि हिन्दुस्तानी पैसे और चमक-दमक के कारण विदेशों में भागते तो
हैं पर क्या बेकदरी होती है उनकी। वहाँ सब हिन्दुस्तानियों को काम
करना पड़ता है। इतनी मैंहगाई है कि एक मित्र दूसरे मित्र को चाय नहीं
पिला सकता। वहाँ इतनी व्यस्त लाइफ है कि किसी दिन यदि जन्मदिन
किसी का पड़ता है तो वह सण्डे को ही मनाया जाता है।वहाँ हर कार्यक्रम
क॑ लिए सण्डे ही निर्धारित है।’हिन्दुस्तानियों जैसी जिन्दगी और जीवन-
शैली तौ वहाँ हो ही नहीं सकती |मेरे उनके बीच एकअनकहा अनुशासन
हमेशा रहा |इतने पुराने और लम्बे समय के सम्बन्धों के बाद भी उन्होंने
कभी ऊँची आवाज में मुझसे बात नहीं की |आज जब फोन पर ये समा-
चार उनके परिवार द्वारा मिला कि “आपके सर अशोक जी नहीं रहे”
तो एक बाए कानों को जैसे विश्वास्त ही नहीं हुआ |बड़ी मुश्किल से रात
काटी | क्योंकि समाचार भी रात्रि ग्यारह बजे मिला था| सुबह साढ़े
सात बजे हाथरस पहुँची तो वहाँ देखती हूँ अधिकतर उनके शिष्य ही हैं
और सब दहाड़े मारकर गुरुजी,गुरुजी चिल्ला रहे हैं, रो रहे हैं कि अब
हम किसके पास जाएँगे,अपनी समस्याओं को लेकर। गुरुजी आप जैसा
वो कोई हो ही नहीं सकता।तमाम स्त्रियाँ रो रही हैं। मैंने उनके अन्तिम
दर्शन किये। ऐसा लग रहा था कि वे थककर सो रहे हैं। चेहरा एकदम
शान्त था।ऐसा लगता था कि अभी उठ-कर हम लोगों से बातें करेंगे।
अन्तिम यात्रा के समय शिष्यों और रिश्तेदारों कीअपार भीड़ थी। मुझे
लगा कि वे मेरे ही नहीं,सबके गुरुजी थे| कितना लगाव था लोगों का
उनसे |यह दृश्य मैं आज तक नहीं भूल पायी हूँ। हरिदासपुर में खेरेश्वर
मन्दिर पर देवकठ के मेले में ज्योतिष सम्मेलन में अध्य- क्षीय भाषण
देते-देते उनके प्राण-पखेरु उड़ गये। इन आत्मीय स्मृततियों के क्षणों
में शब्द भी अर्थहीन हो गये हैं। उन्हें शतशः हार्दिक श्रद्धांजलि।

रीडर, हिन्दी विभाग,
घर्म समाज कॉलिज, अलीगढ़

June 24, 2022

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